SC का बड़ा फैसला: तदर्थ (Ad Hoc) न्यायाधीशों की भूमिका में विस्तार, अब कार्यरत जजों के साथ साझा करेंगे बेंच
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 224A के तहत एक ऐतिहासिक स्पष्टीकरण देते हुए उच्च न्यायालयों में तदर्थ (Ad Hoc) न्यायाधीशों की शक्ति और कार्यक्षेत्र को बढ़ा दिया है। यह कदम न्यायपालिका में करोड़ों लंबित मामलों के त्वरित निपटारे के लिए मील का पत्थर साबित होगा।
मुख्य खबर: बेंच संरचना में बड़ा बदलाव
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सेवानिवृत्त न्यायाधीश, जिन्हें तदर्थ न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया है, अब केवल विशेष बेंचों तक सीमित नहीं रहेंगे:
- वे एकल-न्यायाधीश पीठ (Single-Judge Bench) के रूप में स्वतंत्र रूप से कार्य कर सकते हैं।
- वे खंडपीठ (Division Bench) में वर्तमान में कार्यरत न्यायाधीशों के साथ मिलकर मामलों की सुनवाई कर सकते हैं।
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तुलनात्मक विश्लेषण: 2021 बनाम 2025 के नियम
नीचे दी गई तालिका स्पष्ट करती है कि पिछले नियमों के मुकाबले अब क्या बदलाव आया है:
| विशेषता | अप्रैल 2021 के दिशानिर्देश | दिसंबर 2025 का नया निर्णय |
|---|---|---|
| बेंच की संरचना | केवल ऐसी बेंच जहाँ सभी सदस्य तदर्थ न्यायाधीश हों। | कार्यरत (Serving) न्यायाधीशों के साथ मिलकर खंडपीठ का हिस्सा बन सकते हैं। |
| एकल पीठ अधिकार | सीमित अधिकार थे। | अब स्वतंत्र रूप से एकल-न्यायाधीश पीठ के रूप में कार्य कर सकते हैं। |
| नियुक्ति की शर्त | उच्च न्यायालय में 20% रिक्तियां होना अनिवार्य था। | जनवरी 2025 में इस शर्त को लचीला बनाया गया है। |
| पदानुक्रम (Hierarchy) | पदानुक्रम विवादों से बचने के लिए उन्हें अलग रखा गया था। | मुख्य न्यायाधीश को समन्वय और अध्यक्षता तय करने का अधिकार दिया गया है। |
अनुच्छेद 224A: एक संक्षिप्त परिचय
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 224A राष्ट्रपति की सहमति से उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को ‘तदर्थ न्यायाधीश’ के रूप में नियुक्त करने की शक्ति देता है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है?
- लंबित मामलों का बोझ: भारत में मुकदमों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जिसे अनुभवी न्यायाधीश ही तेजी से निपटा सकते हैं।
- संसाधनों का अधिकतम उपयोग: सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के पास कानूनी बारीकियों का गहरा अनुभव होता है, जिसका लाभ अब नियमित बेंचों को भी मिलेगा।
- न्यायिक लचीलापन: अब हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश आवश्यकतानुसार बेंचों का गठन अधिक प्रभावी ढंग से कर सकेंगे।
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निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय न केवल न्यायिक रिक्तियों की समस्या का समाधान है, बल्कि यह अदालतों की कार्यक्षमता बढ़ाने का एक व्यावहारिक तरीका भी है। अब तदर्थ न्यायाधीशों और कार्यरत न्यायाधीशों का संयुक्त अनुभव आम नागरिक को जल्द न्याय दिलाने में मदद करेगा।